श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 95: गृहस्थके धर्मोंका रहस्य, प्रतिग्रहके दोष बतानेके लिये वृषादर्भि और सप्तर्षियोंकी कथा, भिक्षुरूपधारी इन्द्रके द्वारा कृत्याका वध करके सप्तर्षियोंकी रक्षा तथा कमलोंकी चोरीके विषयमें शपथ खानेके बहानेसे धर्मपालनका संकेत  »  श्लोक 48
 
 
श्लोक  13.95.48 
ऋषय ऊचु:
कुशलं सह दानेन तस्मै यस्य प्रजा इमा:।
फलान्युपधियुक्तानि य एवं न: प्रयच्छति॥ ४८॥
 
 
अनुवाद
ऋषियों ने कहा : जिस राजा की प्रजा ने ये छलपूर्वक फल उसे देने के लिए लाए हैं और जो इन फलों के बदले में हमें स्वर्ण दान कर रहा है, वह अपने दान से प्रसन्न रहे ॥48॥
 
The sages said: May the king, whose subjects have brought these deceitful fruits to give to him and who is donating gold to us in return for the fruits, remain happy with his donations. ॥ 48॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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