श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 95: गृहस्थके धर्मोंका रहस्य, प्रतिग्रहके दोष बतानेके लिये वृषादर्भि और सप्तर्षियोंकी कथा, भिक्षुरूपधारी इन्द्रके द्वारा कृत्याका वध करके सप्तर्षियोंकी रक्षा तथा कमलोंकी चोरीके विषयमें शपथ खानेके बहानेसे धर्मपालनका संकेत  »  श्लोक 47
 
 
श्लोक  13.95.47 
पशुसख उवाच
यद् वै धर्मे परं नास्ति ब्राह्मणास्तद्धनं विदु:।
विनयार्थं सुविद्वांसमुपासेयं यथातथम्॥ ४७॥
 
 
अनुवाद
पशुशक ने कहा, "धर्म के मार्ग पर चलने से जो धन प्राप्त होता है, उससे बढ़कर कोई धन नहीं है। इस धन को केवल ब्राह्मण ही जानते हैं। इसलिए मैं भी उस धर्मयुक्त धन को प्राप्त करने की विधि सीखने के लिए विद्वान ब्राह्मणों की सेवा में लगा हुआ हूँ।" 47.
 
Pashusak said, "There is no wealth greater than that which is obtained by following the path of Dharma. Only Brahmins know about this wealth. Therefore, I am also engaged in the service of learned Brahmins to learn the method of acquiring that Dharma-filled wealth." 47.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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