श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 95: गृहस्थके धर्मोंका रहस्य, प्रतिग्रहके दोष बतानेके लिये वृषादर्भि और सप्तर्षियोंकी कथा, भिक्षुरूपधारी इन्द्रके द्वारा कृत्याका वध करके सप्तर्षियोंकी रक्षा तथा कमलोंकी चोरीके विषयमें शपथ खानेके बहानेसे धर्मपालनका संकेत  »  श्लोक 45
 
 
श्लोक  13.95.45 
अरुन्धत्युवाच
धर्मार्थं संचयो यो वै द्रव्याणां पक्षसम्मत:।
तप:संचय एवेह विशिष्टो द्रव्यसंचयात्॥ ४५॥
 
 
अनुवाद
अरुन्धती बोलीं - इस संसार में लोगों का ऐसा मत है कि धर्म के लिए धन संचय करना चाहिए; परन्तु मेरी दृष्टि में धन संचय की अपेक्षा तप संचय श्रेष्ठ है ॥ 45॥
 
Arundhati said - There is a view among people in this world that wealth should be accumulated for the sake of Dharma; but in my opinion, accumulation of austerity is better than accumulation of wealth. ॥ 45॥
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by acd