श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 95: गृहस्थके धर्मोंका रहस्य, प्रतिग्रहके दोष बतानेके लिये वृषादर्भि और सप्तर्षियोंकी कथा, भिक्षुरूपधारी इन्द्रके द्वारा कृत्याका वध करके सप्तर्षियोंकी रक्षा तथा कमलोंकी चोरीके विषयमें शपथ खानेके बहानेसे धर्मपालनका संकेत  »  श्लोक 43
 
 
श्लोक  13.95.43 
विश्वामित्र उवाच
कामं कामयमानस्य यदा काम: समृध्यते।
अथैनमपर: कामस्तृष्णाविध्यति बाणवत्॥ ४३॥
 
 
अनुवाद
विश्वामित्र बोले—जब किसी व्यक्ति की पहली इच्छा पूरी हो जाती है, तो उसके मन में एक और इच्छा उत्पन्न हो जाती है। इस प्रकार इच्छाएँ मनुष्य के मन पर बाण की तरह प्रहार करती रहती हैं।
 
Vishwamitra said—When a person who desires something gets his first wish fulfilled, another new wish arises. In this way, desire keeps on attacking the mind of a person like an arrow.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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