श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 95: गृहस्थके धर्मोंका रहस्य, प्रतिग्रहके दोष बतानेके लिये वृषादर्भि और सप्तर्षियोंकी कथा, भिक्षुरूपधारी इन्द्रके द्वारा कृत्याका वध करके सप्तर्षियोंकी रक्षा तथा कमलोंकी चोरीके विषयमें शपथ खानेके बहानेसे धर्मपालनका संकेत  »  श्लोक 41
 
 
श्लोक  13.95.41 
भरद्वाज उवाच
उत्पन्नस्य रुरो: शृंगं वर्धमानस्य वर्धते।
प्रार्थना पुरुषस्येव तस्य मात्रा न विद्यते॥ ४१॥
 
 
अनुवाद
भारद्वाज ने कहा, 'जिस प्रकार हिरण का सींग जन्म के साथ बढ़ता रहता है, उसी प्रकार मनुष्य का लोभ भी बढ़ता रहता है, इसकी कोई सीमा नहीं है।
 
Bharadwaj said, 'Just as the horn of a deer keeps on growing as it is born, similarly the greed of a human being keeps on increasing, there is no limit to it.
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by acd