श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 95: गृहस्थके धर्मोंका रहस्य, प्रतिग्रहके दोष बतानेके लिये वृषादर्भि और सप्तर्षियोंकी कथा, भिक्षुरूपधारी इन्द्रके द्वारा कृत्याका वध करके सप्तर्षियोंकी रक्षा तथा कमलोंकी चोरीके विषयमें शपथ खानेके बहानेसे धर्मपालनका संकेत  »  श्लोक 4
 
 
श्लोक  13.95.4 
भीष्म उवाच
मासार्धमासोपवासाद् यत् तपो मन्यते जन:।
आत्मतन्त्रोपघाती यो न तपस्वी न धर्मवित्॥ ४॥
 
 
अनुवाद
भीष्मजी बोले- हे राजन! जो लोग पंद्रह दिन या एक मास तक उपवास करते हैं और उसे तप मानते हैं, वे व्यर्थ ही अपने शरीर को कष्ट देते हैं। वास्तव में, जो केवल उपवास करते हैं, वे न तो तपस्वी हैं और न ही धर्म के ज्ञाता हैं॥4॥
 
Bhishmaji said-O King! Those who fast for fifteen days or a month and consider it to be a penance, they are unnecessarily torturing their bodies. In reality, those who only fast are neither ascetics nor knowers of religion.॥ 4॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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