श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 95: गृहस्थके धर्मोंका रहस्य, प्रतिग्रहके दोष बतानेके लिये वृषादर्भि और सप्तर्षियोंकी कथा, भिक्षुरूपधारी इन्द्रके द्वारा कृत्याका वध करके सप्तर्षियोंकी रक्षा तथा कमलोंकी चोरीके विषयमें शपथ खानेके बहानेसे धर्मपालनका संकेत  »  श्लोक 39
 
 
श्लोक  13.95.39 
वसिष्ठ उवाच
शतेन निष्कगणितं सहस्रेण च सम्मितम्।
तथा बहु प्रतीच्छन् वै पापिष्ठां पतते गतिम्॥ ३९॥
 
 
अनुवाद
वसिष्ठजी ने कहा, 'एक निष्क (स्वर्ण मुद्रा) स्वीकार करना एक लाख निष्क दान के बराबर है। ऐसी स्थिति में, जो अनेक निष्क स्वीकार करता है, उसे घोर पाप में पड़ना पड़ता है।' 39.
 
Vasishtha said, 'Accepting a single Nishka (gold coin) is equivalent to accepting a hundred thousand Nishkas as a donation. In such a situation, the one who accepts many Nishkas has to fall into a very sinful state.' 39.
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by acd