श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 95: गृहस्थके धर्मोंका रहस्य, प्रतिग्रहके दोष बतानेके लिये वृषादर्भि और सप्तर्षियोंकी कथा, भिक्षुरूपधारी इन्द्रके द्वारा कृत्याका वध करके सप्तर्षियोंकी रक्षा तथा कमलोंकी चोरीके विषयमें शपथ खानेके बहानेसे धर्मपालनका संकेत  »  श्लोक 32
 
 
श्लोक  13.95.32 
क्षेत्रं हि दैवतमिदं ब्राह्मणान् समुपाश्रितम्।
अमलो ह्येष तपसा प्रीत: प्रीणाति देवता:॥ ३२॥
 
 
अनुवाद
ब्राह्मण का शरीर देवताओं का निवास है, उसमें सभी देवता विद्यमान हैं। यदि ब्राह्मण तप द्वारा शुद्ध और संतुष्ट हो जाए, तो वह सभी देवताओं को प्रसन्न कर लेता है ॥32॥
 
The body of Brahmins is the abode of the gods, all the gods are present in it. If a Brahmin becomes pure and satisfied through penance, he pleases all the gods. 32॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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