श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 95: गृहस्थके धर्मोंका रहस्य, प्रतिग्रहके दोष बतानेके लिये वृषादर्भि और सप्तर्षियोंकी कथा, भिक्षुरूपधारी इन्द्रके द्वारा कृत्याका वध करके सप्तर्षियोंकी रक्षा तथा कमलोंकी चोरीके विषयमें शपथ खानेके बहानेसे धर्मपालनका संकेत  »  श्लोक 31
 
 
श्लोक  13.95.31 
ऋषय ऊचु:
राजन् प्रतिग्रहो राज्ञां मध्वास्वादो विषोपम:।
तज्जानमान: कस्मात् त्वं कुरुषे न: प्रलोभनम्॥ ३१॥
 
 
अनुवाद
ऋषि बोले - हे राजन! राजा द्वारा दिया गया दान ऊपर से तो शहद के समान मीठा लगता है, किन्तु अन्त में विष के समान भयंकर हो जाता है। यह जानते हुए भी आप हमें क्यों प्रलोभन दे रहे हैं?
 
The sage said - O King! The donation given by the king appears to be as sweet as honey on the surface, but in the end it becomes as dangerous as poison. Knowing this, why are you tempting us?
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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