श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 95: गृहस्थके धर्मोंका रहस्य, प्रतिग्रहके दोष बतानेके लिये वृषादर्भि और सप्तर्षियोंकी कथा, भिक्षुरूपधारी इन्द्रके द्वारा कृत्याका वध करके सप्तर्षियोंकी रक्षा तथा कमलोंकी चोरीके विषयमें शपथ खानेके बहानेसे धर्मपालनका संकेत  »  श्लोक 30
 
 
श्लोक  13.95.30 
वरान् ग्रामान् व्रीहिरसं यवांश्च
रत्नं चान्यद् दुर्लभं किं ददानि।
नास्मिन्नभक्ष्ये भावमेवं कुरुध्वं
पुष्ट्यर्थं व: किं प्रयच्छाम्यहं वै॥ ३०॥
 
 
अनुवाद
इनके अलावा मैं तुम्हें उत्तम गाँव, चावल, रस, जौ, रत्न और अनेक दुर्लभ वस्तुएँ दे सकता हूँ। बताओ, मैं तुम्हें क्या दूँ? इस अखाद्य वस्तु को खाने का तुम्हारा मन नहीं करना चाहिए। बताओ, मैं तुम्हें क्या दूँ जिससे तुम्हारा शरीर पुष्ट हो जाए।
 
Apart from these I can give you good villages, rice, juice, barley, gems and many other rare things. Tell me, what should I give you? You should not feel like eating this inedible thing. Tell me, what should I give you to nourish your body.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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