श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 95: गृहस्थके धर्मोंका रहस्य, प्रतिग्रहके दोष बतानेके लिये वृषादर्भि और सप्तर्षियोंकी कथा, भिक्षुरूपधारी इन्द्रके द्वारा कृत्याका वध करके सप्तर्षियोंकी रक्षा तथा कमलोंकी चोरीके विषयमें शपथ खानेके बहानेसे धर्मपालनका संकेत  »  श्लोक 25
 
 
श्लोक  13.95.25 
कस्मिंश्चिच्च पुरा यज्ञे शैब्येन शिबिसूनुना।
दक्षिणार्थेऽथ ऋत्विग्भ्यो दत्त: पुत्र: पुरा किल॥ २५॥
 
 
अनुवाद
प्राचीन काल में शिबि के पुत्र शैब्य ने अपने एक पुत्र को ऋत्विजों को यज्ञ में दक्षिणा के रूप में दे दिया था ॥25॥
 
In ancient times, Shibi's son Shaibya had given one of his sons to the Ritwijas as dakshina in a yagya. 25॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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