श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 95: गृहस्थके धर्मोंका रहस्य, प्रतिग्रहके दोष बतानेके लिये वृषादर्भि और सप्तर्षियोंकी कथा, भिक्षुरूपधारी इन्द्रके द्वारा कृत्याका वध करके सप्तर्षियोंकी रक्षा तथा कमलोंकी चोरीके विषयमें शपथ खानेके बहानेसे धर्मपालनका संकेत  »  श्लोक 24
 
 
श्लोक  13.95.24 
अथाभवदनावृष्टिर्महती कुरुनन्दन।
कृच्छ्रप्राणोऽभवद् यत्र लोकोऽयं वै क्षुधान्वित:॥ २४॥
 
 
अनुवाद
कुरु नंदन! एक बार पृथ्वी पर बहुत समय तक वर्षा नहीं हुई। जिसके कारण अकाल पड़ गया और सारा संसार भूख से तड़पने लगा। लोगों को बड़ी कठिनाई से अपने प्राण बचाने पड़े। 24.
 
Kuru Nandan! Once there was no rain on the earth for a long time. Due to which there was famine and the whole world started suffering from hunger. People had to save their lives with great difficulty. 24.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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