श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 95: गृहस्थके धर्मोंका रहस्य, प्रतिग्रहके दोष बतानेके लिये वृषादर्भि और सप्तर्षियोंकी कथा, भिक्षुरूपधारी इन्द्रके द्वारा कृत्याका वध करके सप्तर्षियोंकी रक्षा तथा कमलोंकी चोरीके विषयमें शपथ खानेके बहानेसे धर्मपालनका संकेत  »  श्लोक 21-23
 
 
श्लोक  13.95.21-23 
कश्यपोऽत्रिर्वसिष्ठश्च भरद्वाजोऽथ गौतम:।
विश्वामित्रो जमदग्नि: साध्वी चैवाप्यरुन्धती॥ २१॥
सर्वेषामथ तेषां तु गण्डाभूत् कर्मकारिका।
शूद्र: पशुसखश्चैव भर्ता चास्या बभूव ह॥ २२॥
ते च सर्वे तपस्यन्त: पुरा चेरुर्महीमिमाम्।
समाधिनोपशिक्षन्तो ब्रह्मलोकं सनातनम्॥ २३॥
 
 
अनुवाद
एक समय की बात है, कश्यप, अत्रि, वसिष्ठ, भारद्वाज, गौतम, विश्वामित्र, जमदग्नि और पतिव्रता स्त्री अरुन्धती ध्यान द्वारा सनातन ब्रह्मलोक प्राप्त करने की इच्छा से इस पृथ्वी पर तपस्या करते हुए विचरण कर रहे थे। इन सबकी सेवा करने वाली एक दासी थी, जिसका नाम 'गण्डा' था। उसका विवाह पशुशक नामक शूद्र से हुआ था (पशुशक भी इन महर्षियों के साथ रहकर उनकी सेवा करता था)।॥21-23॥
 
Once upon a time, Kashyap, Atri, Vasishtha, Bharadwaj, Gautama, Vishwamitra, Jamadagni and the devoted wife Arundhati were wandering on this earth performing penance with the desire to attain the eternal Brahmaloka through meditation. There was a maidservant who served all of them, whose name was 'Ganda'. She was married to a Shudra named Pasushak (Pashusakh also used to live with these great sages and serve them all).॥21-23॥
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