श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 95: गृहस्थके धर्मोंका रहस्य, प्रतिग्रहके दोष बतानेके लिये वृषादर्भि और सप्तर्षियोंकी कथा, भिक्षुरूपधारी इन्द्रके द्वारा कृत्याका वध करके सप्तर्षियोंकी रक्षा तथा कमलोंकी चोरीके विषयमें शपथ खानेके बहानेसे धर्मपालनका संकेत  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  13.95.17 
देवतातिथिभि: सार्धं पितृभ्यश्चोपभुञ्जते।
रमन्ते पुत्रपौत्रेण तेषां गतिरनुत्तमा॥ १७॥
 
 
अनुवाद
जो मनुष्य देवताओं और अतिथियों सहित पितरों को भोजन कराकर भोजन करते हैं, वे इस लोक में अपने पुत्र-पौत्रों के साथ जीवन का आनंद लेते हैं और मृत्यु के बाद परम गति को प्राप्त होते हैं ॥17॥
 
Those who eat after providing a portion of food to the ancestors along with the gods and guests, enjoy life with their children and grandsons in this world and after death attain the highest salvation. ॥17॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)