श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 95: गृहस्थके धर्मोंका रहस्य, प्रतिग्रहके दोष बतानेके लिये वृषादर्भि और सप्तर्षियोंकी कथा, भिक्षुरूपधारी इन्द्रके द्वारा कृत्याका वध करके सप्तर्षियोंकी रक्षा तथा कमलोंकी चोरीके विषयमें शपथ खानेके बहानेसे धर्मपालनका संकेत  »  श्लोक 15-16
 
 
श्लोक  13.95.15-16 
देवेभ्यश्च पितृभ्यश्च संश्रितेभ्यस्तथैव च।
अवशिष्टानि यो भुंक्ते तमाहुर्विघसाशिनम्॥ १५॥
तेषां लोका ह्यपर्यन्ता: सदने ब्रह्मण: स्मृता:।
उपस्थिता ह्यप्सरसो गन्धर्वैश्च जनाधिप॥ १६॥
 
 
अनुवाद
हे मनुष्यों के स्वामी! जो देवताओं, पितरों तथा आश्रितों को भोजन कराने के बाद बचे हुए अन्न को खाता है, उसे विघषशी कहते हैं। ऐसे पुरुष ब्रह्मधाम में अनन्त लोकों को प्राप्त होते हैं और गंधर्व तथा अप्सराएँ उनकी सेवा में उपस्थित रहती हैं।
 
O Lord of men! One who eats the leftover food after feeding the gods, ancestors and dependents is called Vighsashi. Such men attain eternal worlds in Brahmadham and the Gandharvas and Apsaras are present to serve them.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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