श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 95: गृहस्थके धर्मोंका रहस्य, प्रतिग्रहके दोष बतानेके लिये वृषादर्भि और सप्तर्षियोंकी कथा, भिक्षुरूपधारी इन्द्रके द्वारा कृत्याका वध करके सप्तर्षियोंकी रक्षा तथा कमलोंकी चोरीके विषयमें शपथ खानेके बहानेसे धर्मपालनका संकेत  »  श्लोक 145
 
 
श्लोक  13.95.145 
प्रीयन्ते पितरश्चास्य ऋषयो देवतास्तथा।
यशोधर्मार्थभागी च भवति प्रेत्य मानव:॥ १४५॥
 
 
अनुवाद
देवता, ऋषि और पितर सभी उस पर प्रसन्न होते हैं। वह मनुष्य इस लोक में यश, धर्म और धन पाता है। तथा मृत्यु के बाद स्वर्गलोक में प्रवेश पाता है। 145॥
 
The gods, sages and ancestors are all pleased with him. That person gets fame, religion and wealth in this world. And after death he gets access to heaven. 145॥
 
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि बिसस्तैन्योपाख्याने त्रिनवतितमोऽध्याय:॥ ९३॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें मृणालकी चोरीका उपाख्यानविषयक तिरानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ९३॥

(दक्षिणात्य अधिक पाठके १ १/२ श्लोक मिलाकर कुल १४६ १/२ श्लोक हैं)
 
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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