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श्लोक 13.95.144  |
इदं नर: सुचरितं समवायेषु कीर्तयन्।
अर्थभागी च भवति न च दुर्गाण्यवाप्नुते॥ १४४॥ |
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| अनुवाद |
| जो मनुष्य इस पवित्र कथा का सार्वजनिक रूप से कीर्तन करता है, वह धन और इच्छित वस्तुओं का भागी होता है और उसे कभी कोई कष्ट नहीं होता ॥144॥ |
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| A person who chants this holy story in public becomes a part of wealth and desired objects and never faces any trouble. ॥ 144॥ |
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