श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 95: गृहस्थके धर्मोंका रहस्य, प्रतिग्रहके दोष बतानेके लिये वृषादर्भि और सप्तर्षियोंकी कथा, भिक्षुरूपधारी इन्द्रके द्वारा कृत्याका वध करके सप्तर्षियोंकी रक्षा तथा कमलोंकी चोरीके विषयमें शपथ खानेके बहानेसे धर्मपालनका संकेत  »  श्लोक 144
 
 
श्लोक  13.95.144 
इदं नर: सुचरितं समवायेषु कीर्तयन्।
अर्थभागी च भवति न च दुर्गाण्यवाप्नुते॥ १४४॥
 
 
अनुवाद
जो मनुष्य इस पवित्र कथा का सार्वजनिक रूप से कीर्तन करता है, वह धन और इच्छित वस्तुओं का भागी होता है और उसे कभी कोई कष्ट नहीं होता ॥144॥
 
A person who chants this holy story in public becomes a part of wealth and desired objects and never faces any trouble. ॥ 144॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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