श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 95: गृहस्थके धर्मोंका रहस्य, प्रतिग्रहके दोष बतानेके लिये वृषादर्भि और सप्तर्षियोंकी कथा, भिक्षुरूपधारी इन्द्रके द्वारा कृत्याका वध करके सप्तर्षियोंकी रक्षा तथा कमलोंकी चोरीके विषयमें शपथ खानेके बहानेसे धर्मपालनका संकेत  »  श्लोक 143
 
 
श्लोक  13.95.143 
तस्मात् सर्वास्ववस्थासु नरो लोभं विवर्जयेत्।
एष धर्म: परो राजंस्तस्माल्लोभं विवर्जयेत्॥ १४३॥
 
 
अनुवाद
राजा ! अतः मनुष्य को सभी परिस्थितियों में लोभ का त्याग कर देना चाहिए, क्योंकि यही सबसे बड़ा पुण्य है। अतः लोभ का त्याग अवश्य करना चाहिए ॥143॥
 
King! Therefore, a man should give up greed in all circumstances, because this is the greatest virtue. Therefore, greed must be given up. ॥ 143॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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