श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 95: गृहस्थके धर्मोंका रहस्य, प्रतिग्रहके दोष बतानेके लिये वृषादर्भि और सप्तर्षियोंकी कथा, भिक्षुरूपधारी इन्द्रके द्वारा कृत्याका वध करके सप्तर्षियोंकी रक्षा तथा कमलोंकी चोरीके विषयमें शपथ खानेके बहानेसे धर्मपालनका संकेत  »  श्लोक 141-142
 
 
श्लोक  13.95.141-142 
एवमेते महात्मानो भोगैर्बहुविधैरपि।
क्षुधा परमया युक्ताश्छन्द्यमाना महात्मभि:॥ १४१॥
नैव लोभं तदा चक्रुस्तत: स्वर्गमवाप्नुवन्॥ १४२॥
 
 
अनुवाद
इस प्रकार उन महात्माओंने उस समय भी लोभ नहीं किया जब वे बहुत भूखे थे और जब महान् लोग उन्हें अनेक प्रकार के भोजन का लालच दे रहे थे, तब भी उन्होंने लोभ नहीं किया, इसी कारण उन्हें स्वर्ग की प्राप्ति हुई ॥141-142॥
 
In this way, those great souls did not show any greed at that time even when they were very hungry and when great people tempted them with many kinds of food. Because of this, they attained heaven. ॥141-142॥
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by acd