श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 95: गृहस्थके धर्मोंका रहस्य, प्रतिग्रहके दोष बतानेके लिये वृषादर्भि और सप्तर्षियोंकी कथा, भिक्षुरूपधारी इन्द्रके द्वारा कृत्याका वध करके सप्तर्षियोंकी रक्षा तथा कमलोंकी चोरीके विषयमें शपथ खानेके बहानेसे धर्मपालनका संकेत  »  श्लोक 140
 
 
श्लोक  13.95.140 
भीष्म उवाच
ततो महर्षय: प्रीतास्तथेत्युक्त्वा पुरंदरम्।
सहैव त्रिदशेन्द्रेण सर्वे जग्मुस्त्रिविष्टपम्॥ १४०॥
 
 
अनुवाद
भीष्मजी कहते हैं- युधिष्ठिर! इन्द्र के वचन सुनकर महर्षिगण अत्यन्त प्रसन्न हुए। उन्होंने 'तथास्तु' कहकर देवराज की आज्ञा स्वीकार कर ली। फिर वे सभी देवेन्द्र सहित स्वर्गलोक को चले गए। 140.
 
Bhishmaji says- Yudhishthira! The great sages were very pleased to hear Indra's words. They accepted the order of Devraj by saying 'Tathastu'. Then all of them went to heaven along with Devendra. 140.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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