श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 95: गृहस्थके धर्मोंका रहस्य, प्रतिग्रहके दोष बतानेके लिये वृषादर्भि और सप्तर्षियोंकी कथा, भिक्षुरूपधारी इन्द्रके द्वारा कृत्याका वध करके सप्तर्षियोंकी रक्षा तथा कमलोंकी चोरीके विषयमें शपथ खानेके बहानेसे धर्मपालनका संकेत  »  श्लोक 14
 
 
श्लोक  13.95.14 
अभुक्तवत्सु नाश्नाति ब्राह्मणेषु तु यो नर:।
अभोजनेन तेनास्य जित: स्वर्गो भवत्युत॥ १४॥
 
 
अनुवाद
जो मनुष्य ब्राह्मण के भोजन करने तक भोजन नहीं करता, वह अपने व्रत से स्वर्ग पर विजय प्राप्त करता है ॥14॥
 
A man who does not eat food until a Brahmin has eaten, attains victory over the heaven by his fast. ॥ 14॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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