श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 95: गृहस्थके धर्मोंका रहस्य, प्रतिग्रहके दोष बतानेके लिये वृषादर्भि और सप्तर्षियोंकी कथा, भिक्षुरूपधारी इन्द्रके द्वारा कृत्याका वध करके सप्तर्षियोंकी रक्षा तथा कमलोंकी चोरीके विषयमें शपथ खानेके बहानेसे धर्मपालनका संकेत  »  श्लोक 134
 
 
श्लोक  13.95.134 
शुन:सख उवाच
न्यस्तमद्यं न पश्यद्भिर्यदुक्तं कृतकर्मभि:।
सत्यमेतन्न मिथ्यैतद् बिसस्तैन्यं कृतं मया॥ १३४॥
 
 
अनुवाद
शुन: सखा ने कहा - मुनिवरों! आप जो कह रहे हैं वह ठीक है। वास्तव में मैंने आपका भोजन रख लिया है। जब आप तर्पण कर रहे थे, उस समय आप इधर नहीं देख रहे थे; इसीलिए मैंने वह सब रख लिया था। अतः आपका यह कहना कि आपने मृणाल चुराए हैं, सत्य है। यह मिथ्या नहीं है। वास्तव में मैंने ही वे मृणाल चुराए हैं॥134॥
 
Shuna: Sakha said - Munivars! What you are saying is correct. In fact, I have kept your food. When you were offering tarpan, you were not looking here at that time; that is why I had kept all that. Hence, your statement that you have stolen the Mrinals is correct. It is not false. In fact, I have stolen those Mrinals.॥ 134॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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