श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 95: गृहस्थके धर्मोंका रहस्य, प्रतिग्रहके दोष बतानेके लिये वृषादर्भि और सप्तर्षियोंकी कथा, भिक्षुरूपधारी इन्द्रके द्वारा कृत्याका वध करके सप्तर्षियोंकी रक्षा तथा कमलोंकी चोरीके विषयमें शपथ खानेके बहानेसे धर्मपालनका संकेत  »  श्लोक 133
 
 
श्लोक  13.95.133 
ऋषय ऊचु:
इष्टमेतद् द्विजातीनां योऽयं ते शपथ: कृत:।
त्वया कृतं बिसस्तैन्यं सर्वेषां न: शुन:सख॥ १३३॥
 
 
अनुवाद
ऋषियों ने कहा, "हे मित्र! आपने जो शपथ ली है, वह ब्राह्मणों द्वारा वांछित है। अतः ऐसा प्रतीत होता है कि आपने हमारे मृणाल चुरा लिए हैं।"
 
The sages said, "O friend! The oath you have taken is desired by the Brahmins. Therefore, it seems that you have stolen our Mrinals." 133.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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