श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 95: गृहस्थके धर्मोंका रहस्य, प्रतिग्रहके दोष बतानेके लिये वृषादर्भि और सप्तर्षियोंकी कथा, भिक्षुरूपधारी इन्द्रके द्वारा कृत्याका वध करके सप्तर्षियोंकी रक्षा तथा कमलोंकी चोरीके विषयमें शपथ खानेके बहानेसे धर्मपालनका संकेत  »  श्लोक 119
 
 
श्लोक  13.95.119 
उपाध्यायमध: कृत्वा ऋचोऽध्येतु यजूंषि च।
जुहोतु च स कक्षाग्नौ बिसस्तैन्यं करोति य:॥ ११९॥
 
 
अनुवाद
जो मृणालकी की चोरी करता है, उसे उपाध्याय (शिक्षक या गुरु) को बैठाकर उसके साथ ऋग्वेद और यजुर्वेद का अध्ययन कराने और घास-फूस की अग्नि में आहुति डालने का पाप करना चाहिए ॥119॥
 
The one who steals Mrinalaki, should commit the sin of making the Upadhyay (teacher or guru) sit down and study the Rigveda and Yajurveda with him and throw the oblation in the fire of grass and straw. 119॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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