श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 95: गृहस्थके धर्मोंका रहस्य, प्रतिग्रहके दोष बतानेके लिये वृषादर्भि और सप्तर्षियोंकी कथा, भिक्षुरूपधारी इन्द्रके द्वारा कृत्याका वध करके सप्तर्षियोंकी रक्षा तथा कमलोंकी चोरीके विषयमें शपथ खानेके बहानेसे धर्मपालनका संकेत  »  श्लोक 118
 
 
श्लोक  13.95.118 
भरद्वाज उवाच
नृशंसस्त्यक्तधर्मास्तु स्त्रीषु ज्ञातिषु गोषु च।
ब्राह्मणं चापि जयतां बिसस्तैन्यं करोति य:॥ ११८॥
 
 
अनुवाद
भारद्वाज बोले - "जिस निर्दयी मनुष्य ने मृणाल चुराई है, उसे धर्मत्यागी होना चाहिए। उसे स्त्रियों, कुटुम्बियों और गौओं के साथ पापपूर्ण व्यवहार करना चाहिए तथा शास्त्रार्थ में ब्राह्मण को परास्त करने का पाप करना चाहिए ॥118॥
 
Bharadwaj said, "The ruthless person who stole the Mrinal should be accused of abandoning Dharma. He should be guilty of sinful behaviour with women, family members and cows and should be guilty of defeating a Brahmin in a debate. ॥ 118॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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