श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 95: गृहस्थके धर्मोंका रहस्य, प्रतिग्रहके दोष बतानेके लिये वृषादर्भि और सप्तर्षियोंकी कथा, भिक्षुरूपधारी इन्द्रके द्वारा कृत्याका वध करके सप्तर्षियोंकी रक्षा तथा कमलोंकी चोरीके विषयमें शपथ खानेके बहानेसे धर्मपालनका संकेत  »  श्लोक 117
 
 
श्लोक  13.95.117 
वृथामांसाशनश्चास्तु वृथादानं करोतु च।
यातु स्त्रियं दिवा चैव बिसस्तैन्यं करोति य:॥ ११७॥
 
 
अनुवाद
जो कमल चुराता है, उसे मांस खाने का पाप लगेगा, उसका दान व्यर्थ जाएगा और उसे दिन में स्त्री-संग करने का पाप लगेगा ॥117॥
 
He who steals lotuses will incur the sin of eating meat. His charity will go waste and he will incur the sin of having intercourse with a woman during the day. ॥ 117॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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