श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 95: गृहस्थके धर्मोंका रहस्य, प्रतिग्रहके दोष बतानेके लिये वृषादर्भि और सप्तर्षियोंकी कथा, भिक्षुरूपधारी इन्द्रके द्वारा कृत्याका वध करके सप्तर्षियोंकी रक्षा तथा कमलोंकी चोरीके विषयमें शपथ खानेके बहानेसे धर्मपालनका संकेत  »  श्लोक 116
 
 
श्लोक  13.95.116 
कश्यप उवाच
सर्वत्र सर्वं लपतु न्यासलोपं करोतु च।
कूटसाक्षित्वमभ्येतु बिसस्तैन्यं करोति य:॥ ११६॥
 
 
अनुवाद
कश्यप बोले, 'जिसने मृणालों को चुराया है, वह सर्वत्र नाना प्रकार की बातें कहने, दूसरों की संपत्ति हड़पने तथा झूठी गवाही देने का दोषी होगा।
 
Kasyapa said, 'The one who has stolen the Mrinals will be guilty of saying all kinds of things everywhere, usurping the property of others and giving false testimony.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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