श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 95: गृहस्थके धर्मोंका रहस्य, प्रतिग्रहके दोष बतानेके लिये वृषादर्भि और सप्तर्षियोंकी कथा, भिक्षुरूपधारी इन्द्रके द्वारा कृत्याका वध करके सप्तर्षियोंकी रक्षा तथा कमलोंकी चोरीके विषयमें शपथ खानेके बहानेसे धर्मपालनका संकेत  »  श्लोक 113
 
 
श्लोक  13.95.113 
अत्रिरुवाच
स गां स्पृशतु पादेन सूर्यं च प्रतिमेहतु।
अनध्यायेष्वधीयीत बिसस्तैन्यं करोति य:॥ ११३॥
 
 
अनुवाद
अत्रि बोले - जो मृणाल चुराएगा, उसे गाय को लात मारने, सूर्य की ओर मुख करके मूत्र त्याग करने तथा अनावश्यक समय में अध्ययन करने का पाप लगेगा।
 
Atri said - He who steals Mrinal will be guilty of the sin of kicking a cow, urinating facing the Sun and studying at times when it is not necessary to study.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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