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श्लोक 13.95.108  |
श्रमेण महता कृत्वा ते बिसानि कलापश:।
तीरे निक्षिप्य पद्मिन्यास्तर्पणं चक्रुरम्भसा॥ १०८॥ |
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| अनुवाद |
| फिर उसने बड़े यत्न से भिन्न-भिन्न बोझ बाँधे और उन्हें किनारे पर रखकर सरोवर का जल अर्पण करने लगा॥108॥ |
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| Then with great effort he tied up the different loads. After this he kept them on the bank and started offering water from the lake.॥ 108॥ |
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