श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 95: गृहस्थके धर्मोंका रहस्य, प्रतिग्रहके दोष बतानेके लिये वृषादर्भि और सप्तर्षियोंकी कथा, भिक्षुरूपधारी इन्द्रके द्वारा कृत्याका वध करके सप्तर्षियोंकी रक्षा तथा कमलोंकी चोरीके विषयमें शपथ खानेके बहानेसे धर्मपालनका संकेत  »  श्लोक 101
 
 
श्लोक  13.95.101 
यातुधान्युवाच
नामनैरुक्तमेतत् ते दु:खव्याभाषिताक्षरम्।
नैतद् धारयितुं शक्यं गच्छावतर पद्मिनीम्॥ १०१॥
 
 
अनुवाद
यातुधानी ने कहा, "आपने अपने नाम के लिए जो व्याख्या की है, उसके अक्षरों का उच्चारण करना भी मेरे लिए कठिन है। इसलिए मैं उसे याद नहीं कर सकता। अब आप भी तालाब पर जाइए।"
 
Yaatudhaani said, "It is difficult for me to even pronounce the letters of the explanation given by you for your name. Therefore, I cannot remember it. Now you too go to the pond."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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