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श्लोक 13.95.100  |
पशुसख उवाच
पशून् रञ्जामि दृष्ट्वाहं पशूनां च सदा सखा।
गौणं पशुसखेत्येवं विद्धि मामग्निसम्भवे॥ १००॥ |
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| अनुवाद |
| पशु सखा बोले - हे अग्नि से उत्पन्न प्राणी ! मैं पशुओं को प्रसन्न रखता हूँ और उनका प्रिय मित्र हूँ; इसी गुण के अनुसार मेरा नाम पशु सखा है ॥ 100॥ |
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| Pasu Sakha said - O creature born from fire! I keep the animals happy and am their dear friend; according to this quality my name is Pasu Sakha.॥ 100॥ |
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