श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 95: गृहस्थके धर्मोंका रहस्य, प्रतिग्रहके दोष बतानेके लिये वृषादर्भि और सप्तर्षियोंकी कथा, भिक्षुरूपधारी इन्द्रके द्वारा कृत्याका वध करके सप्तर्षियोंकी रक्षा तथा कमलोंकी चोरीके विषयमें शपथ खानेके बहानेसे धर्मपालनका संकेत  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक  13.95.1 
युधिष्ठिर उवाच
द्विजातयो व्रतोपेता हविस्ते यदि भुञ्जते।
अन्नं ब्राह्मणकामाय कथमेतत् पितामह॥ १॥
 
 
अनुवाद
युधिष्ठिर ने पूछा, "पितामह! यदि कोई व्रत करने वाला ब्राह्मण अपनी इच्छा पूरी करने के लिए ब्राह्मण को दिया गया श्राद्ध का भोजन खा ले, तो आपको कैसा लगता है?" (क्या उसका व्रत तोड़ना या ब्राह्मण की प्रार्थना अस्वीकार करना उचित है?)॥1॥
 
Yudhishthira asked, "Grandfather! If a Brahmin who is observing fast, eats food offered as Shraddha to a Brahmin to fulfil his wish, how do you feel about it?" (Is it right to break his fast or refuse the request of a Brahmin?)॥1॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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