श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 94: पितर और देवताओंका श्राद्धान्नसे अजीर्ण होकर ब्रह्माजीके पास जाना और अग्निके द्वारा अजीर्णका निवारण, श्राद्धसे तृप्त हुए पितरोंका आशीर्वाद  »  श्लोक 22-23
 
 
श्लोक  13.94.22-23 
प्रेतास्तु पिण्डसम्बन्धान्मुच्यन्ते तेन कर्मणा॥ २२॥
इत्येषा पुरुषश्रेष्ठ श्राद्धोत्पत्तिर्यथागमम्।
व्याख्याता पूर्वनिर्दिष्टा दानं वक्ष्याम्यत: परम्॥ २३॥
 
 
अनुवाद
पिण्ड के संसर्ग से भूत (मृत पितर आदि) प्रेत योनियों के कष्टों से मुक्त हो जाते हैं । हे पुरुषोत्तम ! शास्त्रों के अनुसार मैंने पहले जो श्राद्ध की उत्पत्ति का प्रसंग बताया था, वह विस्तारपूर्वक आपसे कह दिया है । अब मैं आपसे दान के विषय में कहूँगा । 22-23॥
 
Ghosts (dead fathers etc.) get relieved from the sufferings of ghosts due to their association with Pinda. Best man! According to the scriptures, I have told you in detail the incident of the origin of Shraddha which was told earlier. Now I will tell you about donation. 22-23॥
 
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि श्राद्धकल्पे द्विनवतितमोऽध्याय:॥ ९२॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें श्राद्धकल्पविषयक बानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ९२॥

 
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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