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mahabharat 13.93.9-10h: प्रातःकाल जब वे उठे, तो उनका मन पुत्र-शोक से व्यथित रहा; किन्तु उनकी बुद्धि अत्यन्त विशाल थी। उसी से उन्होंने अपने मन को शोक से हटाकर एकाग्रचित्त होकर श्राद्धकर्म का चिन्तन किया।   |   mahabharat अध्याय 13.93: शोकातुर निमिका पुत्रके निमित्त पिण्डदान तथा श्राद्धके विषयमें निमिको महर्षि अत्रिका उपदेश, विश्वेदेवोंके नाम एवं श्राद्धमें त्याज्य वस्तुओंका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 93: शोकातुर निमिका पुत्रके निमित्त पिण्डदान तथा श्राद्धके विषयमें निमिको महर्षि अत्रिका उपदेश, विश्वेदेवोंके नाम एवं श्राद्धमें त्याज्य वस्तुओंका वर्णन  »  श्लोक 9-10h
 
 
श्लोक  13.93.9-10h 
तस्यासीत् प्रतिबुद्धस्य शोकेन व्यथितात्मन:।
मन: संवृत्य विषये बुद्धिर्विस्तारगामिनी॥ ९॥
तत: संचिन्तयामास श्राद्धकल्पं समाहित:।
 
 
अनुवाद
प्रातःकाल जब वे उठे, तो उनका मन पुत्र-शोक से व्यथित रहा; किन्तु उनकी बुद्धि अत्यन्त विशाल थी। उसी से उन्होंने अपने मन को शोक से हटाकर एकाग्रचित्त होकर श्राद्धकर्म का चिन्तन किया।
 
When he woke up in the morning, his mind remained distressed with the grief of his son; But his intellect was very broad. Through that, he diverted his mind from grief and contemplated the rituals of Shraddha with concentration. 9 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)