श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 93: शोकातुर निमिका पुत्रके निमित्त पिण्डदान तथा श्राद्धके विषयमें निमिको महर्षि अत्रिका उपदेश, विश्वेदेवोंके नाम एवं श्राद्धमें त्याज्य वस्तुओंका वर्णन  »  श्लोक 42
 
 
श्लोक  13.93.42 
निवापे हव्यकव्ये वा गर्हितं च सुदर्शनम्।
पितरश्च हि देवाश्च नाभिनन्दन्ति तद्धवि:॥ ४२॥
 
 
अनुवाद
श्राद्ध-सम्बन्धी पवित्र काव्य में सुदर्शन सोमलता की निन्दा की गई है। विश्वेदेव तथा पितर उस यज्ञ को पसंद नहीं करते। 42॥
 
Sudarshan Somlata is condemned in the sacred poetry related to Shraddha. Vishvedev and the ancestors do not like that sacrifice. 42॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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