श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 93: शोकातुर निमिका पुत्रके निमित्त पिण्डदान तथा श्राद्धके विषयमें निमिको महर्षि अत्रिका उपदेश, विश्वेदेवोंके नाम एवं श्राद्धमें त्याज्य वस्तुओंका वर्णन  »  श्लोक 28
 
 
श्लोक  13.93.28 
ते श्राद्धेनार्च्यमाना वै विमुच्यन्ते ह किल्बिषात्।
सप्तक: पितृवंशस्तु पूर्वदृष्ट: स्वयम्भुवा॥ २८॥
 
 
अनुवाद
‘श्राद्ध द्वारा इनका पूजन करने से श्राद्धकर्ता के पितर पापों से मुक्त हो जाते हैं। अग्निश्वत्त आदि जिन पितरों को ब्रह्माजी ने पहले ही श्राद्ध के योग्य बताया है, उनकी संख्या सात है।॥28॥
 
‘By worshipping them through Shraddha, the forefathers of the Shraddha performer are liberated from sins. The number of forefathers like Agnishwatta etc. whom Brahmaji has earlier declared as eligible for Shraddha is seven.॥ 28॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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