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mahabharat 13.93.20: तुमने जो यज्ञ किया है, उससे डरो मत। ब्रह्माजी ने ही सबसे पहले इस धर्म का अनुभव किया था।   |   mahabharat अध्याय 13.93: शोकातुर निमिका पुत्रके निमित्त पिण्डदान तथा श्राद्धके विषयमें निमिको महर्षि अत्रिका उपदेश, विश्वेदेवोंके नाम एवं श्राद्धमें त्याज्य वस्तुओंका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 93: शोकातुर निमिका पुत्रके निमित्त पिण्डदान तथा श्राद्धके विषयमें निमिको महर्षि अत्रिका उपदेश, विश्वेदेवोंके नाम एवं श्राद्धमें त्याज्य वस्तुओंका वर्णन  »  श्लोक 20
 
 
श्लोक  13.93.20 
निमे संकल्पितस्तेऽयं पितृयज्ञस्तपोधन।
मा ते भूद् भी: पूर्वदृष्टो धर्मोऽयं ब्रह्मणा स्वयम्॥ २०॥
 
 
अनुवाद
तुमने जो यज्ञ किया है, उससे डरो मत। ब्रह्माजी ने ही सबसे पहले इस धर्म का अनुभव किया था।
 
Do not be afraid of the sacrifice you have performed. Brahma himself was the first to experience this religion.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)