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mahabharat 13.93.17: ‘अहा! मैंने वह क्यों किया जो ऋषियों ने पहले कभी नहीं किया? मेरा मनमाना व्यवहार देखकर ब्राह्मण मुझे अपने शापों से क्यों नहीं जला देते?’॥17॥   |   mahabharat अध्याय 13.93: शोकातुर निमिका पुत्रके निमित्त पिण्डदान तथा श्राद्धके विषयमें निमिको महर्षि अत्रिका उपदेश, विश्वेदेवोंके नाम एवं श्राद्धमें त्याज्य वस्तुओंका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 93: शोकातुर निमिका पुत्रके निमित्त पिण्डदान तथा श्राद्धके विषयमें निमिको महर्षि अत्रिका उपदेश, विश्वेदेवोंके नाम एवं श्राद्धमें त्याज्य वस्तुओंका वर्णन  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  13.93.17 
अकृतं मुनिभि: पूर्वं किं मयेदमनुष्ठितम्।
कथं नु शापेन न मां दहेयुर्ब्राह्मणा इति॥ १७॥
 
 
अनुवाद
‘अहा! मैंने वह क्यों किया जो ऋषियों ने पहले कभी नहीं किया? मेरा मनमाना व्यवहार देखकर ब्राह्मण मुझे अपने शापों से क्यों नहीं जला देते?’॥17॥
 
‘Oh! Why did I do what the sages never did before? Why won’t the Brahmins burn me to ashes with their curses after seeing my arbitrary behaviour?’॥17॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)