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mahabharat 13.93.16: इस प्रकार श्राद्ध करने के पश्चात् महामुनि निमि अपने में धर्ममिश्रण करने की ग्लानि अनुभव करते हुए (अर्थात् यह सोचकर कि मैंने पुत्र के निमित्त पिता, पितरों आदि के निमित्त वेदों में वर्णित श्राद्ध को स्वेच्छापूर्वक किया है) महान पश्चाताप से भर गए और इस प्रकार चिंता करने लगे - 16॥   |   mahabharat अध्याय 13.93: शोकातुर निमिका पुत्रके निमित्त पिण्डदान तथा श्राद्धके विषयमें निमिको महर्षि अत्रिका उपदेश, विश्वेदेवोंके नाम एवं श्राद्धमें त्याज्य वस्तुओंका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 93: शोकातुर निमिका पुत्रके निमित्त पिण्डदान तथा श्राद्धके विषयमें निमिको महर्षि अत्रिका उपदेश, विश्वेदेवोंके नाम एवं श्राद्धमें त्याज्य वस्तुओंका वर्णन  »  श्लोक 16
 
 
श्लोक  13.93.16 
तत् कृत्वा स मुनिश्रेष्ठो धर्मसंकरमात्मन:।
पश्चात्तापेन महता तप्यमानोऽभ्यचिन्तयत्॥ १६॥
 
 
अनुवाद
इस प्रकार श्राद्ध करने के पश्चात् महामुनि निमि अपने में धर्ममिश्रण करने की ग्लानि अनुभव करते हुए (अर्थात् यह सोचकर कि मैंने पुत्र के निमित्त पिता, पितरों आदि के निमित्त वेदों में वर्णित श्राद्ध को स्वेच्छापूर्वक किया है) महान पश्चाताप से भर गए और इस प्रकार चिंता करने लगे - 16॥
 
After performing the Shraddha in this way, Nimi, the great sage, feeling guilty of mixing religion in himself (that is, thinking that I have willingly performed the Shraddha which is prescribed in the Vedas for the purpose of the father, forefathers etc., for the sake of the son), became filled with great remorse and started worrying like this - 16॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)