श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 93: शोकातुर निमिका पुत्रके निमित्त पिण्डदान तथा श्राद्धके विषयमें निमिको महर्षि अत्रिका उपदेश, विश्वेदेवोंके नाम एवं श्राद्धमें त्याज्य वस्तुओंका वर्णन  »  श्लोक 12
 
 
श्लोक  13.93.12 
अमावास्यां महाप्राज्ञो विप्रानानाय्य पूजितान्।
दक्षिणावर्तिका: सर्वा बृसी: स्वयमथाकरोत्॥ १२॥
 
 
अनुवाद
तत्पश्चात् उन महाज्ञानी ऋषि ने अमावस्या के दिन सात ब्राह्मणों को बुलाकर उनकी पूजा की और स्वयं उनके लिए प्रदक्षिणा की दिशा में कुश के आसन बनाकर उन्हें उन पर बैठाया ॥12॥
 
Thereafter, that great wise sage called seven Brahmins on the day of Amavasya and worshiped them and he himself made for them seats of Kush folded in the direction of Pradakshina and made them sit on them. 12॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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