|
| |
| |
श्लोक 13.93.1-2  |
युधिष्ठिर उवाच
केन संकल्पितं श्राद्धं कस्मिन् काले किमात्मकम्।
भृग्वंगिरसिके काले मुनिना कतरेण वा॥ १॥
कानि श्राद्धानि वर्ज्यानि कानि मूलफलानि च।
धान्यजात्यश्च का वर्ज्यास्तन्मे ब्रूहि पितामह॥ २॥ |
| |
| |
| अनुवाद |
| युधिष्ठिर ने पूछा, "पितामह! श्राद्ध कब प्रचलित हुआ? किस महर्षि ने सर्वप्रथम इसका प्रचार करने का संकल्प किया? श्राद्ध का स्वरूप क्या है? यदि इसका प्रारंभ भृगु और अंगिरा के काल में हुआ, तो किस ऋषि ने इसका प्रकटीकरण किया? श्राद्ध में कौन-कौन से कर्म, कौन-कौन से फल-मूल तथा कौन-कौन से खाद्य पदार्थ त्याज्य हैं? यह मुझे बताइए।" |
| |
| Yudhishthira asked, "Grandfather! When did Shraddha become popular? Which great sage first resolved to propagate it? What is the nature of Shraddha? If it started in the times of Bhrigu and Angira, then which sage revealed it? Which deeds, which fruits and roots and which food items are to be discarded in Shraddha? Tell me that. 1-2. |
| ✨ ai-generated |
| |
|