श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 92: श्राद्धमें ब्राह्मणोंकी परीक्षा, पंक्तिदूषक और पंक्तिपावन ब्राह्मणोंका वर्णन, श्राद्धमें लाख मूर्ख ब्राह्मणोंको भोजन करानेकी अपेक्षा एक वेदवेत्ताको भोजन करानेकी श्रेष्ठताका कथन  »  श्लोक 46
 
 
श्लोक  13.92.46 
सम्भोजनी नाम पिशाचदक्षिणा
सा नैव देवान् न पितॄनुपैति।
इहैव सा भ्राम्यति हीनपुण्या
शालान्तरे गौरिव नष्टवत्सा॥ ४६॥
 
 
अनुवाद
जो लोग एक-दूसरे के यहाँ भोजन करते हैं और एक-दूसरे से दक्षिणा लेते-देते हैं, उनका दान पिशाच-दक्षिणा कहलाता है। वह न तो देवताओं को पहुँचता है और न ही पितरों को। जैसे बछड़े की मृत्यु के बाद, पुण्यहीन गाय, दुःखी होकर गौशाला में घूमती रहती है, उसी प्रकार आपस में दी और ली गई दक्षिणा इस लोक में ही रह जाती है, पितरों को नहीं पहुँचती॥ 46॥
 
Those who eat food at each other's place and give and take dakshina from each other, their donation is called pishcha-dakshina. It neither reaches the gods nor the ancestors. Just as a cow whose calf has died, without any virtue, keeps roaming around the cowshed in sorrow, similarly the dakshina given and taken between each other remains in this world only and does not reach the ancestors.॥ 46॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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