श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 92: श्राद्धमें ब्राह्मणोंकी परीक्षा, पंक्तिदूषक और पंक्तिपावन ब्राह्मणोंका वर्णन, श्राद्धमें लाख मूर्ख ब्राह्मणोंको भोजन करानेकी अपेक्षा एक वेदवेत्ताको भोजन करानेकी श्रेष्ठताका कथन  »  श्लोक 44
 
 
श्लोक  13.92.44 
यथोषरे बीजमुप्तं न रोहे-
न्न चावप्ता प्राप्नुयाद् बीजभागम्।
एवं श्राद्धं भुक्तमनर्हमाणै-
र्न चेह नामुत्र फलं ददाति॥ ४४॥
 
 
अनुवाद
जैसे बंजर भूमि पर बोया गया बीज न तो अंकुरित होता है और न बोने वाले को कोई फल मिलता है, उसी प्रकार श्राद्ध में अपात्र ब्राह्मणों को दिया गया भोजन न तो इस लोक में लाभदायक होता है और न परलोक में उसका कोई फल मिलता है ॥ 44॥
 
Just as a seed sown on a barren land neither germinates nor does the sower reap any benefits, similarly the food offered to unworthy brahmins in the Shraddha ceremony is neither beneficial in this world nor does it yield any results in the next one. ॥ 44॥
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by AmritChaitanyaDas