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mahabharat 13.92.43: अतः श्राद्धकर्ता को अपने मित्रों को श्राद्ध में आमंत्रित नहीं करना चाहिए। मित्रों को संतुष्ट करने के लिए धन देना उचित है। श्राद्ध में भोजन केवल उसी को कराना चाहिए जो मध्यस्थ हो, शत्रु या मित्र को नहीं। 43॥   |   mahabharat अध्याय 13.92: श्राद्धमें ब्राह्मणोंकी परीक्षा, पंक्तिदूषक और पंक्तिपावन ब्राह्मणोंका वर्णन, श्राद्धमें लाख मूर्ख ब्राह्मणोंको भोजन करानेकी अपेक्षा एक वेदवेत्ताको भोजन करानेकी श्रेष्ठताका कथन   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 92: श्राद्धमें ब्राह्मणोंकी परीक्षा, पंक्तिदूषक और पंक्तिपावन ब्राह्मणोंका वर्णन, श्राद्धमें लाख मूर्ख ब्राह्मणोंको भोजन करानेकी अपेक्षा एक वेदवेत्ताको भोजन करानेकी श्रेष्ठताका कथन  »  श्लोक 43
 
 
श्लोक  13.92.43 
तस्मान्मित्रं श्राद्धकृन्नाद्रियेत
दद्यान्मित्रेभ्य: संग्रहार्थं धनानि।
यन्मन्यते नैव शत्रुं न मित्रं
तं मध्यस्थं भोजयेद्धव्यकव्ये॥ ४३॥
 
 
अनुवाद
अतः श्राद्धकर्ता को अपने मित्रों को श्राद्ध में आमंत्रित नहीं करना चाहिए। मित्रों को संतुष्ट करने के लिए धन देना उचित है। श्राद्ध में भोजन केवल उसी को कराना चाहिए जो मध्यस्थ हो, शत्रु या मित्र को नहीं। 43॥
 
Therefore, the Shraddha performer should not invite his friends for the Shraddha. It is appropriate to give money to satisfy friends. In Shraddha, food should be served only to someone who is a mediator rather than an enemy or a friend. 43॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)