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mahabharat 13.92.18: राजा! एक आँख वाला मनुष्य पंक्ति में बैठे हुए साठ लोगों को अपवित्र करता है। नपुंसक मनुष्य सौ लोगों को अपवित्र करता है और श्वेत कुष्ठ से पीड़ित मनुष्य पंक्ति में बैठे हुए जितने लोगों को देखता है, उन सभी को अपवित्र करता है॥18॥   |   mahabharat अध्याय 13.92: श्राद्धमें ब्राह्मणोंकी परीक्षा, पंक्तिदूषक और पंक्तिपावन ब्राह्मणोंका वर्णन, श्राद्धमें लाख मूर्ख ब्राह्मणोंको भोजन करानेकी अपेक्षा एक वेदवेत्ताको भोजन करानेकी श्रेष्ठताका कथन   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 92: श्राद्धमें ब्राह्मणोंकी परीक्षा, पंक्तिदूषक और पंक्तिपावन ब्राह्मणोंका वर्णन, श्राद्धमें लाख मूर्ख ब्राह्मणोंको भोजन करानेकी अपेक्षा एक वेदवेत्ताको भोजन करानेकी श्रेष्ठताका कथन  »  श्लोक 18
 
 
श्लोक  13.92.18 
षष्टिं काण: शतं षण्ढ: श्वित्री यावत्प्रपश्यति।
पंक्त्यां समुपविष्टायां तावद् दूषयते नृप॥ १८॥
 
 
अनुवाद
राजा! एक आँख वाला मनुष्य पंक्ति में बैठे हुए साठ लोगों को अपवित्र करता है। नपुंसक मनुष्य सौ लोगों को अपवित्र करता है और श्वेत कुष्ठ से पीड़ित मनुष्य पंक्ति में बैठे हुए जितने लोगों को देखता है, उन सभी को अपवित्र करता है॥18॥
 
King! A one-eyed man pollutes sixty people sitting in a row. A person who is impotent, impures a hundred people and a person suffering from white leprosy, pollutes all the people he sees sitting in a row.॥ 18॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)