श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 92: श्राद्धमें ब्राह्मणोंकी परीक्षा, पंक्तिदूषक और पंक्तिपावन ब्राह्मणोंका वर्णन, श्राद्धमें लाख मूर्ख ब्राह्मणोंको भोजन करानेकी अपेक्षा एक वेदवेत्ताको भोजन करानेकी श्रेष्ठताका कथन  »  श्लोक 13-14
 
 
श्लोक  13.92.13-14 
सोमविक्रयिणे विष्ठा भिषजे पूयशोणितम्॥ १३॥
नष्टं देवलके दत्तमप्रतिष्ठं च वार्धुषे।
यत्तु वाणिजके दत्तं नेह नामुत्र तद् भवेत्॥ १४॥
 
 
अनुवाद
सोमरस बेचने वाले को श्राद्ध में दिया गया भोजन पितरों के लिए मल के समान है। श्राद्ध में वैद्य को दिया गया भोजन पितरों को मवाद और रक्त के समान ग्रहणयोग्य नहीं होता। मंदिर में पूजा करके जीविका चलाने वाले को दिया गया श्राद्ध व्यर्थ होता है और उसका कोई फल नहीं होता। सूदखोर को दिया गया भोजन अस्थिर होता है। व्यापार करने वाले को दिया गया श्राद्ध न तो इस लोक में लाभदायक होता है और न ही परलोक में।॥13-14॥
 
The food offered in the Shraddha ceremony to a seller of Som-rasa is like feces for the ancestors. The food offered to a doctor in the Shraddha ceremony is unacceptable to the ancestors like pus and blood. The Shraddha offering given to a person who earns his livelihood by worshipping in a temple is wasted and does not yield any fruit. The food offered to an usurer is unstable. The Shraddha offering given to a person engaged in business is neither beneficial in this world nor in the next.॥13-14॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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