श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 9: ब्राह्मणको देनेकी प्रतिज्ञा करके न देने तथा उसके धनका अपहरण करनेसे दोषकी प्राप्तिके विषयमें सियार और वानरके संवादका उल्लेख एवं ब्राह्मणोंको दान देनेकी महिमा  »  श्लोक 6
 
 
श्लोक  13.9.6 
अथैतद् वचनं प्राहुर्धर्मशास्त्रविदो जना:।
निशम्य भरतश्रेष्ठ बुद्‍ध्या परमयुक्तया॥ ६॥
 
 
अनुवाद
हे भारतश्रेष्ठ! धर्मशास्त्रों का ज्ञाता पुरुष अपनी परम योगबुद्धि से विचार करके उपरोक्त बात कहता है॥6॥
 
Bharatshrestha! A person knowledgeable in religious scriptures says the above after considering it with his supremely yogic intellect. 6॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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