श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 9: ब्राह्मणको देनेकी प्रतिज्ञा करके न देने तथा उसके धनका अपहरण करनेसे दोषकी प्राप्तिके विषयमें सियार और वानरके संवादका उल्लेख एवं ब्राह्मणोंको दान देनेकी महिमा  »  श्लोक 4-5
 
 
श्लोक  13.9.4-5 
यां रात्रिं जायते जीवो यां रात्रिं च विनश्यति।
एतस्मिन्नन्तरे यद् यत् सुकृतं तस्य भारत॥ ४॥
यच्च तस्य हुतं किंचिद् दत्तं वा भरतर्षभ।
तपस्तप्तमथो वापि सर्वं तस्योपहन्यते॥ ५॥
 
 
अनुवाद
भरतनन्दन! हे भरतश्रेष्ठ! जीवात्मा जन्मरात्रि और मृत्युरात्रि में जो भी पुण्यकर्म करता है, वह अपने जीवन में जो भी यज्ञ, दान और तप करता है, वे सब व्रतभंग के पाप से नष्ट हो जाते हैं॥ 4-5॥
 
Bharatanandan! Whatever pious deeds a soul performs during the night of his birth and the night of his death, O best of the Bharatas! Whatever sacrifices, alms and austerities he performs during his lifetime, all of them are destroyed by the sin of breaking his vow.॥ 4-5॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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