श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 9: ब्राह्मणको देनेकी प्रतिज्ञा करके न देने तथा उसके धनका अपहरण करनेसे दोषकी प्राप्तिके विषयमें सियार और वानरके संवादका उल्लेख एवं ब्राह्मणोंको दान देनेकी महिमा  »  श्लोक 21
 
 
श्लोक  13.9.21 
यं निरीक्षेत संक्रुद्ध आशया पूर्वजातया।
प्रदहेच्च हि तं राजन् कक्षमक्षय्यभुग् यथा॥ २१॥
 
 
अनुवाद
हे राजन! अपनी पूर्व आशाओं की असफलता के कारण क्रोध में भरा हुआ ब्राह्मण जिस किसी को भी देखता है, उसे उसी प्रकार जलाकर भस्म कर देता है, जैसे अग्नि सूखी लकड़ी या तिनकों के भार को जला देती है।
 
O King! Due to the disappointment of his earlier hopes, a Brahmin filled with great anger burns to ashes anyone he looks at, just as fire burns a load of dry wood or straws.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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