श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 9: ब्राह्मणको देनेकी प्रतिज्ञा करके न देने तथा उसके धनका अपहरण करनेसे दोषकी प्राप्तिके विषयमें सियार और वानरके संवादका उल्लेख एवं ब्राह्मणोंको दान देनेकी महिमा  »  श्लोक 18
 
 
श्लोक  13.9.18 
न हर्तव्यं विप्रधनं क्षन्तव्यं तेषु नित्यश:।
बालाश्च नावमन्तव्या दरिद्रा: कृपणा अपि॥ १८॥
 
 
अनुवाद
ब्राह्मण का धन कभी नहीं चुराना चाहिए। यदि वे कोई अपराध भी करें, तो भी उनके प्रति सदैव क्षमाशील रहना चाहिए। चाहे वे बालक हों, दरिद्र हों, दीन हों, उनका कभी अनादर नहीं करना चाहिए॥18॥
 
One should never steal money from a brahmin. Even if they commit a crime, one should always be forgiving towards them. Even if they are children, poor or downtrodden, one should never disrespect them.॥18॥
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by acd